इस समय बादलों का वर्कलोड बढ़ा हुआ है,
हर तरफ़ बारिश का ऑर्डर चढ़ा हुआ है,
प्लानर तो इन्द्र देवता ही होंगे जनाब,
लगता है स्वर्ग में भी मीटिंगों का दौर बढ़ा हुआ है।
अरब सागर से पानी की लोडिंग होती होगी,
बंगाल की खाड़ी से भी सप्लाई होती होगी,
किस बादल को कितना माल उठाना है,
इन्द्र की एक्सेल शीट में पूरी एंट्री होती होगी।
कहीं हल्की बारिश, कहीं मूसलाधार का ऑर्डर है,
कहीं बादल खाली, कहीं पानी से ओवरलोडर है,
किस खेत में कब कितनी बूँद गिरानी है,
इसका भी शायद कोई विभागीय कैलेंडर है।
अनलोडिंग की प्लानिंग भी आसान नहीं होगी,
हर जगह एक जैसी डिमांड तो नहीं होगी,
कहीं किसान आसमान की ओर हाथ जोड़कर बैठा है,
कहीं शहर कह रहा होगा… बस करो, अब और नहीं होगी!
पहले बादलों की रूट मैपिंग होती होगी,
फिर हवाओं से उनकी बुकिंग होती होगी,
कहाँ जाना है, कहाँ रुकना है, कहाँ बरसना है,
हर बूंद की शायद GPS ट्रैकिंग होती होगी।
पहाड़ों पर अलग ही ड्यूटी लगती होगी,
नदियों के लिए अलग डिलीवरी चलती होगी,
रेगिस्तान में शायद पानी की वीआईपी डिमांड हो,
और शहरों में ड्रेनेज विभाग से रोज़ शिकायत मिलती होगी।
कहीं बादल कहते होंगे… लोड बहुत भारी है,
कहीं धरती कहती होगी… अभी प्यास हमारी है,
इन्द्र देवता माथा पकड़कर सोचते होंगे,
भाई! मौसम की मैनेजमेंट भी कोई आसान जिम्मेदारी है?
हम तो बस खिड़की से बादल देखकर खुश हो जाते हैं,
वे जाने कितनी फाइलें ऊपर से नीचे पहुँचाते हैं,
अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक सप्लाई उठाकर,
धरती के हर कोने में पानी अनलोड करवाते हैं।
कुदरत की यह सप्लाई चेन बड़ी निराली है,
न ट्रक है, न टोल है, न कोई गाड़ी वाली है,
फिर भी समय पर पानी पहुँच जाता है खेतों तक…
मानना पड़ेगा, इन्द्र देवता की प्लानिंग कमाल की है!
-रतन कुमार कैथवास
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