आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अपनों को, अपना वक्त चाहिए

                
                                                         
                            उसकी बातें कभी-कभी नसों के लहू उबाल देती थीं,
                                                                 
                            
न जाने कैसी-कैसी शिकायतें उसके लबों पर आती थीं।
दिल का चैन ग़ायब, दिमाग़ परेशान हो जाता,
मैं सोचता… आख़िर ये लड़की चाहती क्या है,
जो बात हो, उसे सीधे-सीधे क्यों नहीं बताती है?

मैंने एक दिन कहा, “जो बात मन में हुआ करे,
या, मेरी कोई आदत तुम्हें पसंद न हो,
तो शांत मन से बता दिया करो,
यूँ हर बात पर नाराज़ होना भी कोई बात है?
आख़िर तुम्हें चाहिए क्या, ज़रा साफ़-साफ़ कहा करो।”

वो भी कहाँ चुप रहने वालों में से थी,
बोली, “तुम भी तो मुझे पसंद नहीं हो हर बात में,
तो क्या करूँ, तुमसे प्यार करना छोड़ दूँ?
हर कमी पर रिश्ता तोड़ दूँ?
ज़रा अपनी अक़्ल को भी कभी काम में लिया करो!”

मैंने माथा पकड़ा, मन ही मन बुदबुदाया,
“लगता है मोहतरमा का मिज़ाज कुछ ज़्यादा ही गरमाया।
चलो, अब बहस से कोई नतीजा नहीं निकलने वाला,
उठो, बाहर चलते हैं… चाय पीते हैं,
शायद चाय का प्याला कुछ काम कर जाए।”

वो बोली, “कहाँ चलना है अब?”
मैंने कहा, “अरे, वहीं चलते हैं जनाब,
जहाँ पहली बार हमारी मुलाक़ात हुई थी,
जहाँ तुमने चाय की चुस्की लेते हुए मुस्कुराकर देखा था,
और मैंने चुपके से तुम्हें अपना दिल दे दिया था।”

हम पहुँचे उसी पुराने ठिकाने पर,
दो कुल्हड़ चाय रखी गई हमारे सामने।
न कोई शिकवा, न कोई लंबी दलील,
बस चाय की भाप, कुछ पुरानी यादें,
और धीरे-धीरे सामान्य होती दिल की धड़कनें।

चाय ख़त्म हुई तो उसका चेहरा भी खिल गया,
जो मामला इतना उलझा था, पल भर में सुलझ गया।
मैंने सोचा, इतनी देर की बहस का हासिल क्या निकला?
न कोई फ़ैसला, न कोई क़ानून, न कोई समझौता,
बस साथ बैठने से दिल का बोझ हल्का निकला।

काफ़ी विश्लेषण के बाद एक बात समझ आई,
उसकी नाराज़गी के पीछे कोई बड़ी माँग नहीं थी भाई।
उसे न महँगे तोहफ़े चाहिए थे, न चाँद-सितारे,
न हर रोज़ मोहब्बत के बड़े-बड़े वादे हमारे।

उसे बस मेरा वक़्त चाहिए था, मेरा साथ चाहिए था,
दिन भर की बातों में मेरा थोड़ा-सा ध्यान चाहिए था।
मैं प्यार को शब्दों और वादों में तलाशता रहा,
वो मेरे साथ के छोटे-छोटे लम्हों में प्यार देखती रही।

उस दिन से मैंने एक बात गाँठ बाँध ली,
हर नाराज़गी को बेवजह की ज़िद नहीं मानूँगा।
कभी उसकी सुनूँगा, कभी अपनी कहूँगा,
हर मसले को बहस की अदालत में नहीं ले जाऊँगा।

क्योंकि उलफ़त में हर बार जीतना ज़रूरी नहीं होता,
हर सवाल का जवाब तर्क से पूरा नहीं होता।
कभी-कभी रिश्ते को बस थोड़ी-सी तवज्जो चाहिए,
और सारी दुनिया से बढ़कर, अपनों को, अपना वक़्त चाहिए।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर