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अपने "दिये" खुद बनें

                
                                                         
                            मैंने जो लिख कर भेजा,
                                                                 
                            
उसे तुमने पढ़ा,
परंतु कायदे से समझा भी क्या।
मैंने तो बस इतना कहा था…
अपने “दिए” ख़ुद बनना,
और अँधेरों से लड़ते हुए,
लोगों को रोशनी भी देना,
सिर्फ़ जलना ही काफ़ी नहीं,
किसी को रास्ता दिखाया भी क्या।
दीवारों पर उजाले टाँगने से,
सुबह नहीं होती,
अपने भीतर की कालिख से,
कभी सामना किया भी क्या।
हर बार दूसरों की लौ से,
उम्मीद बाँधते रहे,
कभी अपनी बाती को,
हौसलों के तेल में, भिगोया भी क्या।
शब्द अगर केवल सुनने भर के हों,
तो उनका वजूद अधूरा है,
जो सीखा था ज़िंदगी से,
उसे जीकर, दिखाया भी क्या।
दरिया की शिकायत छोड़ो,
प्यास का हिसाब भी रखो,
हाथों में कटोरा था मगर,
आसमान को कोसा भी क्या।
मैंने तो बस एक हुनर सिखाया था…
गिरो तो अपने पैरों पर,
उठो तो किसी और को भी उठाना,
वरना जीतकर, पाया भी क्या।
जब कभी तुम्हारा नाम,
किसी की दुआ में शामिल हो,
तब समझना कि सचमुच,
अपने “दिए” ख़ुद बनें ,
और रोशनी भी दी…
वरना यूँ ही उम्र भर जले,
तो जिया भी तो क्या जिया।
-रतन कुमार कैथवास
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3 महीने पहले

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