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अक्स वहीं मिल जाता

                
                                                         
                            आईना ग़ौर से तूने कभी देखा ही नहीं,
                                                                 
                            
मेरा अक्स तो वहीं मिल जाता।
जिस रोज़ तू ख़ुद से दो पल बातें करता,
मेरा नाम तेरी ख़ामोशियों में खिल जाता।
तुझे लगता रहा कि फ़ासले बहुत हैं दरमियाँ,
मैं तो तेरी हर मुस्कान के पीछे चल पड़ता।
तू एक बार मुड़कर देखता अगर,
मेरा साया तेरे क़दमों से ही मिल जाता।
याद है वो बरसाती शाम,
जब भीगते हुए तूने हथेली से चेहरा पोंछा था,
उस एक बूँद में भी मेरा इंतज़ार था,
तू ठहरता तो शायद सब कुछ मिल जाता।
मैंने कभी चाँद नहीं माँगा,
न सितारों की कोई सौग़ात माँगी,
बस इतना चाहता था,
तेरी आँखों में अपने लिए, एक यक़ीन मिल जाता।
एक बूढ़े फ़क़ीर ने, राह में मुझसे कहा था,
"जिसे लोग दुनिया भर में ढूँढ़ते फिरते हैं,
वो अक्सर किसी, अपने की आँखों में छूट जाता है।"
बरसों बाद जब, तू उसी पुराने घर लौटा,
दीवारें बदल चुकी थीं, दरवाज़े नए हो गए थे,
मगर आईना, अब भी वहीं टँगा था,
धूल से ढका हुआ… ख़ामोश।
तूने धीरे से उसकी सतह साफ़ की,
और पहली बार ख़ुद को गौर से देखा।
चेहरे पर उम्र थी, आँखों में सफ़र था,
और उन गहराइयों में, कहीं मेरा अक्स, अब भी मुस्कुरा रहा था।
तब समझ आया…
मोहब्बत हमेशा साथ चलने का नाम नहीं होती,
कभी-कभी वो किसी आईने में उम्र भर इंतज़ार करती है।
आईना ग़ौर से तूने कभी देखा ही नहीं,
मेरा अक्स तो वहीं मिल जाता।
तू दुनिया भर में मुझे ढूँढ़ता रहा,
और मैं तेरी अपनी नज़रों में ही ठहरा रहा|
-रतन कुमार कैथवास
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3 महीने पहले

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