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आँसू हमें चैन लेने न दें

                
                                                         
                            किसका है ज़ख़्म, किसकी सज़ा… क्या फ़र्क़ है यहाँ,
                                                                 
                            
हर दर्द की टीस हमारे ही दिल में है।

जो रो रहा है दूर किसी अनजान शहर में,
उसकी भी एक आह हमारे नजर में है।

किसी की आँख में आँसू हमें चैन लेने न दें,
शायद ये किसी का भी दर्द हमारी फ़ितरत में है।

हमसे न पूछो कौन हमारा, कौन पराया,
इंसानियत का रिश्ता ही सबसे मुकम्मल है।

जिसके भी हिस्से में अँधेरा मिला ज़िंदगी में,
उसके लिए एक दिया हमारी तरफ से नजराना है।

दुनिया हमें चाहे किसी भी नाम से पुकारे,
हमको तो हर इंसान अपने ही सफ़र के मुसाफिर लगे हैं।
-रतन कुमार कैथवास
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2 दिन पहले

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