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तुम इंकार की हुंकार भरते हो,

                
                                                         
                            तुम इंकार की हुंकार भरते हो,
                                                                 
                            
इज़हार चेहरे से हम पढ़ते हैं।
हर्फ़ों की किताबें क्या पढ़नी,
अनपढ़ ही सही, पर अच्छे हैं।
जब दिल लगाकर कुछ न सीखा,
ज़िंदगी के पन्ने उलटते-पलटते हैं।
दुनिया के लिए बिरले ही पन्ने खुले हैं,
तुम पर शायरी के सफ़्हे जुड़ते चलते हैं।
न तुमसे शिकायत, न दुनिया से,
हर हाल में नाम लेकर जी लेते हैं।

ख़ुदा का लिखा दोनों का मुक़द्दर,
हाशिए मिलेंगे ज़रूर, दुआ में हाथ उठते हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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