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नम आंखों से रुखसती

                
                                                         
                            नम आंखों से रुखसती,
                                                                 
                            
तार तार होते सपनें,
कैसे हम भुल जाँये,
गुजारे जो पल साथ हमने।
नम आँखों...।।

खामोश जर थी जूबान,
उठते न थे कदम भी ,
बस एकटक तकती निगाहें ,
ओझल हुए थे अपने।
नम आँखों...।।

एक एक कर सब चित्र आदव,
देने लगा दिल को दिलाशा,
छाती पिघल के संभला ,
आँखें लगी बरसने।
नम आँखों...।।

रिश्तों के डोर की जकड़न,
देता नहीं इजाजत,
चौखट खटक खटक कर,
माथा लगी रगड़ने।
नम आँखों...।।

बामुश्किल हाथ छुड़ाया,
कितने इसरार कितने तक़वे,
कितने ख्वाहिश कितने मौजू,
गले से लगे मचलने।
नम आँखों...।।
-राणा ब्रजेश
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2 महीने पहले

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