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एक तेवरी

                
                                                         
                            शीत भरी जनवरी काँपता थर-थर-थर ‘होरी’
                                                                 
                            
बिना रजाई के ‘धनिया’ घर आफत-सी आयी।

नये बजट के साथ फरवरी और वित्तमंत्री
नये करों के बोझ तले फिर जनता घबरायी।

आया फागुन माह मनी यूँ तो घर-घर होली
पहले-सा उल्लास कहीं भी पड़ा न दिखलायी।

अप्रिल माह उछाल भरी सोने ने-चाँदी ने
पूछ न एक अँगूठी हमने कैसे बनवायी।

माह मई में महँगाई की लूओं ने मारा
सौ रुपये की दाल किलो-भर घर सजनी लायी।

जून महीना खूब पसीना झल्लन का छूटा
बिन बिजली के पंखा झलते रैना ढुलकायी।

माह जुलाई पड़ी फुहारें मन पर यूँ दुःख की
मन के भीतर पीर अभावों की झट हरियायी।

आजादी के इत अगस्त में झंडे लहरायें
उधर न करता चपरासी तक जन की सुनवायी।

माह सितंबर मन के अम्बर सूख गये जलधर
एक नया अवसाद लिये फिर नव उलझन छायी।

अक्टूबर आया जाड़े की चिंताएँ लेकर
‘क्या होगा इस साल रजाई अगर न भर पायी’?

माह नवम्बर में दीवाली रही अमीरों की
निर्धन को तो बनी लक्ष्मी फिर से दुःखदायी।

पुनः दिसम्बर, अन्त साल का, खुशी न दे पाया
जो जागी थी मन में आशा वो भी मुरझायी | 
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4 दिन पहले

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