डर फैल रहा
अब चीख़-भरा स्वर फैल रहा।
सुख डूब गए
बस दुःख का सागर फैल रहा।
हर फसल मरी
पत्थर ही पत्थर फैल रहा।
बेगानापन
अब मन के भीतर फैल रहा।
सुरसा जैसा
वह रूप दिखाकर फैल रहा।
क्या राजनीति!
हर किस्सा बदतर फैल रहा।
- *रमेशराज*
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