उनको बादाम-मुनक्के हैं
इत भूख गरीबी धक्के हैं |
हम रोजगार को भटक रहे
उत इंतजाम सब पक्के हैं ||
दर्दों के नैन-मटक्के हैं
सुख गुमसुम हक्के-बक्के हैं |
जनता तो ज़ीरो पर आउट
महंगाई के अब छक्के हैं ||
उत मस्ती धूम-धड्क्के हैं
इत जमे खून के थक्के हैं |
नित धर्म-धर्म वे चीख रहे
सब देख उन्हें भौचक्के हैं ||
-रमेशराज
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