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चातुर्मास : चेतना के चतुर्दीप

                
                                                         
                            चातुर्मास : चेतना के चतुर्दीप
                                                                 
                            

घिर आए घन, गगन गूँज उठा, हरित धरा मुस्काई है,
आषाढ़ी शुभ एकादशी ने साधना-शहनाई गाई है।
श्रीहरि योगनिद्रा में सोए, जग का कोलाहल थम जाए,
शिव संभालें सृष्टि का रथ, मन अंतर्मुख पथ पर आए।

यह केवल ऋतु का परिवर्तन, केवल तिथि का मान नहीं,
यह आत्मा के आँगन में जागा ईश्वर का अभियान यहीं।
बाहर वर्षा की जलधारा, भीतर भक्ति की धारा बहे,
तन भी निर्मल, मन भी उज्ज्वल, जीवन सत्य-सुगंधित रहे।

श्रावण की प्रत्येक बूँद में "हर-हर" का उद्गार बसा,
बेलपत्र की कोमल पाती में शिव का निर्मल प्यार बसा।
गंगाजल की पावन धारा जब शिवशिर पर झर-झर बहती,

मन के भीतर बैठी कालिमा मौन विलय होकर रहती।
नीलकंठ का संदेश अमर है—विष पीना भी तप होता है,
क्रोध, कपट, ईर्ष्या का दावानल धैर्य-हृदय में सोता है।
जो अपमानों को पी जाए, जो प्रतिशोध भुला दे हँसकर,

वही मनुष्य शिवत्व प्राप्त कर अमृत बरसाए जग पर।
फिर भाद्रपद की शुभ वेला में मंगल-गान सुनाई दे,
गणनायक के चरण-कमल से बुद्धि-दीप झिलमिलाई दे।
वक्रतुण्ड मुस्काकर बोले—पहले मन के द्वार खोलो,

लोभ, मोह के जाल हटाओ, सत्य-विवेक का दीप जलाओ।
विघ्न नहीं पथ की चट्टानों में, विघ्न नहीं संसारों में,
विघ्न छिपे हैं मन की गहरी स्वार्थ भरी दीवारों में।
अंतर के अवरोध हटेंगे, तब जीवन मुस्काएगा,

ज्ञान-सूर्य का प्रथम प्रभात अज्ञान-तम हर लाएगा।
आश्विन आया, शक्ति-ज्योति से नभ का कण-कण दीप्त हुआ,
माँ दुर्गा के चरणों में फिर श्रद्धा का संसार झुका।
महिषासुर कोई बाहर नहीं, भीतर बैठा अभिमान है,

जिसने उसको जीत लिया, वही सच्चा बलवान है।
नवरात्रि का अर्थ नहीं बस नौ दिन भूखे रह जाना,
नवरात्रि है मन के भीतर नव संस्कारों को जगाना।
करुणा, साहस, सत्य, समर्पण, सेवा का श्रृंगार करो,

अपने भीतर बैठी देवी का श्रद्धा से सत्कार करो।
कार्तिक की मुस्काती संध्या दीपों का उत्सव लाती है,
अंधकार की लाख चुनौती एक शिखा झुठलाती है।
मिट्टी का छोटा-सा दीपक सूर्य नहीं कहलाता है,

किन्तु घोर निशा के सम्मुख भी हार कभी न खाता है।
तुलसी की पावन पत्तियों में जीवन का सद्भाव बहे,
देवोत्थान की मंगल बेला नव आशा का प्रभाव रहे।
चार महीनों की तपश्चर्या अब फलवन्ती हो जाए,

मन का सोया देव जागकर जीवन-दीप जलाए।
भक्ति बने व्यवहार हमारा, जप बन जाए श्वासों में,
तप बनकर मुस्काए धैर्य कठिन से कठिन प्रयासों में।
दान केवल धन का क्यों हो? प्रेम, समय भी दान बने,

सेवा केवल देवालय की नहीं, मनुज का सम्मान बने।
आत्मशुद्धि का अर्थ नहीं बस गंगाजल से तन धोना,
मन के मैल, कपट के कण-कण, अश्रु-विवेक से स्वयं धोना।
जो अपने अंतःकरण में प्रतिदिन दीप जलाता है,

वही मनुष्य स्वयं जीवन का चलता-फिरता तीर्थ कहलाता है।
ऋषियों का यह ज्ञान अनश्वर, ऋतु के संग जीवन ढलता,
संयम से स्वास्थ्य सुरक्षित, सत्कर्मों से भाग्य सँवरता।
वर्षा में संयम का व्रत भी प्रकृति-विज्ञान सुनाता है,

धर्म और विज्ञान सनातन का अद्भुत सेतु बन जाता है।
देवशयनी से देवोत्थान तक केवल देव नहीं सोते,
सोई रहती मानव-चेतना, जागे तभी प्रभात होते।
श्रीहरि की योगनिद्रा कहती—"पहले अपने मन में झाँको,

मुझको मंदिर में खोजोगे, पहले स्वयं को तो पहचानो।"
आओ ऐसा व्रत धारण करें, मन में मधुमय भाव जगे,
द्वेष-दहन की धूल हटे, करुणा के नव चाव जगे।
चार महीनों का यह पर्व नहीं, जीवन का अनुबंध बने,

मानवता के पथ पर चलकर हर हृदय स्वयं आनंद बने।
जब तक मन के तम का अंत न हो, दीपावली अधूरी है;
जब तक भीतर शिव न जागें, हर पूजा मजबूरी है।
चातुर्मास पुकार रहा है—स्वयं को स्वयं में खोजो तुम,
ईश्वर बाहर कम मिलता है, पहले अपने भीतर खोजो तुम।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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