आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कहानी समय की (रमन काव्य धारा पुस्तक से प्रस्तुत)

                
                                                         
                            समय मुताबिक हमेशा हमेशा
                                                                 
                            
संसार में सब होता होना ।
कभी बिछुड़ने के दिन हैं आते
कभी होता है सुखद मिलना ।
अशुभ समय के आते आते
वृक्षों को भी होता है रोना।
सदा हितैषी बने रहे जो -
उन पत्तों का होता साथ छोड़ना।
परस्पर सहयोग से पोषण था मिलता
और संग संग था सुशोभित होना।
समय के नाते सम्बन्ध को भूले
प्रीति पर लग गया जैसे टोना ।
पुष्प पंखुडी पर जल बूंद का टिकना
कितना संयोग सुहावन समय यह होना ।
हो रही बूंद कितना प्रसन्न चित्त इस दम
भाग्य अपने पर खुशी यो होना ।
मगर बीच इसी डाल का हिलना
हुआ बूंद पानी पर पानी का फिरना ।
क्या कर पाती बेचारी समय की मारी।
कुछ न रहा इसके निज बस में होना ।
गिरी फालिजी सी धरा पर आकर
क्षण में मिट गया अस्तित्व का होना ।

जीवनान्त समय के आते आते
होता ऐसे ही संयोग का होना।
थी सुगन्ध शोभा जब तक सुमन में
रहता इन पर भौरों का मडराना।
फूल के मुरझाते ही देखकर इसको
इनका न होता निकट से गुजरना।
लगता ऐसा न प्रीति किया कभी था
न इनके अंगो से हुआ था खेलना ।
समय ही तो है आज इन्हे न पूछता कोई
न वर का हार बनना
न किसी शव पर चढ़ना ।
फूल के स्थान छोड़ने के पहले
हो जाता नव पुष्प का आगमन होना।
वंश परम्परा यो हमेशा चलती रहती
न होता वंश का विनष्ट कभी होना ।
पुनः फिर जब सुसमय का संयोग आता
बिछुडे हुए को होता है मिलना।
देखो बसन्त समय के आते आते
होता वृक्षों को नव पल्लवों का मिलना।
फिर हरे भरे शोभायमान हैं होते
लगता जैसे रंक को खजाने का मिलना ।
भौरे पुनः गुंजारने मडराने हैं लगते
जब फूलो को हो जाता है खिलना ।

माली भी इनसा प्रफुल्लित तब होता
जैसे हुआ परिश्रम के फल का मिलना ।
अवश्य एक दिन मिलता परिश्रम का फल
यदि शुभ समय का होता संग में होना।
अशुभ समय में सब उल्टा हो जाना
अपना भी तब न अपना कहाँ होना ।
शुभ अशुभ समय होते कर्म पर निर्भर
मन माफिक होता समय का बोना ।
अच्छे कर्म से सदा शुभ है होता
अशुभ तो होता अपने से दुष्कर्म, का होना ।
इसलिये सदा शुभ कर्म है करते रहना
ताकि खराब समय रमन कभी न होना ।
मानव तन बड़े पुण्य प्रताप से मिलता
इसे व्यर्थ में न सोचो कभी तुम खोना ।
हरिशरण में रहते प्रेम करो इनसे
इनसे ही है तव कल्याण का होना
-रामकुमार जायसवाल रमन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर