जिंदगी के दिन चार, सब जानते हैं यार,
फिर भी आदत गुलामी, सब काम के बीमार।
बार बार बार, सबको एक ही बुखार,
ये कैसी तलब है, है ये कैसा खुमार।
उलझा हर इंसान, है ये आदत में शुमार,
जिंदगी के दिन चार, सब जानते हैं यार,
फिर भी आदत गुलामी, सब काम के बीमार।
मैं कहता हूँ जी लो, थोड़ा काम है यार,
मैं कहता हूँ पी लो, नशा काम का है यार।
होके जिंदा भी लगते जिंदा लाश से मेरे यार,
जीना ये जीना क्या जीना है मेरे यार।
जिंदगी के दिन चार, सब जानते हैं यार,
फिर भी आदत गुलामी, सब काम के बीमार।
न्यू ईयर रेजोल्यूशन सब लेते हर बार,
कभी पहाड़ तो कभी घोड़ी चढ़ने को तैयार।
फिर टारगेट्स का प्रेशर, गुलाम हाजिर तैयार,
सांचे में ढालते प्रोजेक्ट, जैसे मटके को कुम्हार,
शेक्सपियर के नॉवेल से ये हीरो, मरने को तैयार।
टारगेट भी क्या चीज़ है, एक के बाद एक तैयार,
अप्रैजल की तड़प में, ये लपकने को तैयार,
रखता वाइब्रेंट वाइब, ना लगने का लाचार।
ये काम भी क्या काम है, क्या सब काम ही है यार,
जिंदगी के दिन चार, सब जानते हैं यार,
फिर भी आदत गुलामी, सब काम के बीमार।
ये 'con कॉल' के फेर में, सिरदर्दी हर बार,
'एसैप' (ASAP) कमेंट्स से भरा है, हर इनबॉक्स यार।
संडे डिस्कशन की होड़ में, खो गया इतवार,
प्रपोजल्स के प्रोसेस में ही कट रही टाइम की रफ़्तार।
चाय की चुस्की में ही मिलती है राहत मेरे यार,
वरना ई-ऑफिस की फाइल्स में ही दफन है संसार।
काम तुझे काम में ले लेगा, मेरे यार,
जी नहीं हर पल मर रहा, होके काम से बीमार।
ये चुड़ैल है डायन सी चिमटी है यार,
ले भभूत भैरव की, भगा उतार।
बहुत मर लिया काम में, जी ले मेरे यार,
उड़ा दे धुआँ बना हर फिक्र, मेरी जान-दिलदार।
जिंदगी के दिन चार, सब जानते हैं यार...
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