देश में अगर गधे को गद्दी मिल जाए,
तो चालीस की चीनी भी अस्सी मिल जाए।
सोचो गुजरात के गधे फिर क्या खाएंगे,
सुप्रीम कोर्ट की मुझे जो कुर्सी मिल जाए।
विकास की बाहों में है भारत मान लूँ,
बस घरों में लाडली बहना हँसती मिल जाए।
मरुस्थल में मुसाफ़िर कब तलक भटके,
दुआ है राह में कोई तो बस्ती मिल जाए।
त्योहारों पे गांव चले आना चायबाजों,
शायद चूल्हे पे चाय छनती मिल जाए।
(2) उसकी आंखों से ये अंदाजे जा रहा है,
वो भरी भीड़ में हमको तांके जा रहा है।
एक रोज़ उसकी गली से गुजर पड़े थे,
वो खिड़की से अब भी झांके जा रहा है।
किसी दिन उसकी बैंच पे जा बैठे थे हम,
आज भी उसके नाम से आंके जा रहा है।
वो शाम के वक्त शहर की सड़क से गुजरेगा,
ये सुन मेरे जैसा शख़्स टोल–नांके जा रहा है।
जो लगे थे ज़ख्म मोहब्बत के मैदान में हमें,
उन निशानों को शेर–गज़लों से ढांके जा रहा है।
बना दिया था गांव ने सरपंच ये सोच के,
कुछ तो करेंगे वो विकास कार्य रोज़ के,
हुआ कुछ भी नहीं पंचायत में तो ये लगा,
कि पचा गए वो पूरी पूंजी नोंच–नोंच के।
पहले उसकी धड़कन में समाना पड़ता है,
तब जाकर हाथ बदन में लगाना पड़ता है,
इतना आसां भी नहीं है ये प्यार का सफर,
क्योंकि इस उलझन में ज़माना पड़ता है।
जंगलों में पेड़ अब नज़र नहीं आते,
जो दिन गुजरे वो लौटकर नहीं आते,
कुछ इस तरह बदला है जमाना,
कि अब रिश्ते भी कच्चे घर नहीं आते।
-राजकुमार बैरागी
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