आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सोता हुआ इंसान

                
                                                         
                            सुबह और शाम के सूरज की सूरत में
                                                                 
                            
फर्क़ कोई ख़ास नहीं होता,
वही लालिमा वही आसमां पीला वही
पंछियों का चहकता हुजूम होता,
फर्क़ नज़र आता है तभी जब उतरती रोशनी
या घिरता है अंधेरा,
मगर सोता हुआ यह इंसान क्या जाने
उसका सूरज उग रहा या डूबता!!
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर