सुबह और शाम के सूरज की सूरत में
फर्क़ कोई ख़ास नहीं होता,
वही लालिमा वही आसमां पीला वही
पंछियों का चहकता हुजूम होता,
फर्क़ नज़र आता है तभी जब उतरती रोशनी
या घिरता है अंधेरा,
मगर सोता हुआ यह इंसान क्या जाने
उसका सूरज उग रहा या डूबता!!
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