लगाते रहिये नऐ-नऐ पौधे रोज़,
फल भी आऐंगे,
अपने लगे बाग़ की फसल पीछे,
अपने ही खाऐंगे,
क़दमों और दिमाग़ का हरकत में रखना है ज़रुरी,
कर्म का मुलाज़िम है नसीब सदा,
अदब में झुका पाऐंगे.
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