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चिकने पत्ते से ढ़लकती बूंद सी ज़िंदगी पे

                
                                                         
                            चिकने पत्ते से ढ़लकती बूंद सी ज़िंदगी पे
                                                                 
                            
इतना ग़ुरूर क्यूँ है?
समंदर में गिरने से पहले उफनती नदी में
इतना शोर क्यूँ है?
रहगुज़र सीधी या चलें तिरछी तरफ़ विकाश,
मिलतीं हैं 'उसी' मोड़ पर,
फ़िर क़ायनात को उंगली पे नचाने का
इतना फितूर क्यूँ है?
जानते हैं नशा है ताक़त का इस बोतल में
पर महज़ दो घूंट में इतना सुरुर क्यूँ है?
हर शख़्स को अंदाज़ है अपनी औक़ात का,
तेरा पैर चादर से इतना बाहर क्यूँ है?
कुर्सी का मतलब तानाशाही क़तई नहीं होता,
ज़िम्मेदारियों से तू इतना बेज़ार क्यूँ है?
थक गया होगा उम्रदराज़ हो चला है तू अब,
रास्ता देने से इतना इनकार क्यूँ है?
उमड़ती नदी बरसात की ज़लज़ले ले आती है,
तुझे एहसास इतना कमतर क्यूँ है?

 
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1 सप्ताह पहले

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