क़ायनात भर में फैले आसमां के पैबंद सा
ये बादल ज़रा सा,
सूरज अगर सताए तो औक़ात उसे बताऐ
यही बादल ज़रा सा,
घूमता-फिरता है यूँ तो अपनी मौज
हवा के संग मज़े में,
अपनी पे आ जाय गर तो लाता है ज़लज़ला
ये बादल ज़रा सा.
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