आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बादल व्यथा

                
                                                         
                            कौन जाने व्यथा आवारा निरीह बादल की,
                                                                 
                            
बेचारा सदा एकल ही चला है,
ऊपर गर्माता आकाश नीचे धरती की प्यास,
लिए अपरिमित भार वर्षा का,
चिंतित इस आकाश से उस आकाश डोलता,
रुआं-रुआं होता बिखरता-सिमटता
व्यक्तित्व के कोटिशः रुपों में बिगड़ता-निखरता,
समय की दी वेदना से व्यथित बादल,
अपरिचित सा परिचित संसार को दूर से निरखता है,
यूँ तो हर ऋतु से इसका है परिचय,
किंतु वर्षा से इसका संबंध प्रगैतिहासिक घना है,
संग है वर्षा तो सूर्य को भी धता है,
आंनदमय गरजन कभी नृत्य आयोजन तड़ित का,
करता कहीं सूखा कहीं ज़लज़ला है,
वर्षा का इतिहास रहा किंतु औरंगज़ेबी सल्तनत सा,
विरह की अग्नि में बादल बारम्बार गला है,
कौन जाने कौन हल करे हृदय की व्यथा बादल की,
अपने आप में यह वस्तुतः एकल ही रहा है,
मनुष्य के जीवन की कहानी भी रहती आई है बादल सी,
अपने सुख और दुख में ही सदा निर्लिप्त रहा है.

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर