रेत पर तेरा नाम लिखता हूँ मिटाता हूँ
मोज़ें बार-बार आकर पूछती हैं मुझसे
रोज़ ये किसका पता तलाशते हो
मैं मुस्कुराकर कहता हूँ कोई नहीं, बस यूँ ही
मोज़ों से कहता हूँ बहा ले जाओ ये अल्फ़ाज़
मगर वो भी लौटा देती हैं मुझे ही वापस
शायद समंदर भी जानता है
मिटाने से ख़यालात नहीं मिटते ख़ास
फिर भी हर शाम आता हूँ इसी साहिल पर
उंगली से वही हुरूफ़ तराशता हूँ
मिटकर भी अगर तू रहे तो सिर्फ़ मेरे लिए
इसीलिए रेत पर नफ़ासत से
तेरा नाम लिखता हूँ मिटाता हूँ
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