बारिश जो हुई, तो मुद्दत से उजड़े रास्ते भी कुछ कहने लगे,
जो घुट रहे थे भीतर ही भीतर, वो कल-कल कर बहने लगे।
जो शाखें सूख चुकी थीं कब से, उन पर नए पत्ते आ गए,
जो परिंदे रूठ गए थे कब से, वो फिर आके मुंडेर पे रहने लगे।
वो यादें, वो बातें, जो ख्वाबों बनकर धूल में खो गई थीं,
सावन की हवा चली तो ख़्वाब भी हक़ीक़त को सहने लगे।
एक अरसे से था दिल में जो सूनापन, वो पल में दूर हुआ,
जब बूँदें गिरीं इस सूखी मिट्टी पर, तो ज़ख़्म पुराने भरने लगे।
सब ख़ामोशी की ज़ंजीरें टूट गईं उस बारिश के आने से,
जो शिकवे दबे थे इस सीने में, वो शब्द बनकर गुनगुनाने लगे।
''अगस्त्य' इस बरसात ने दिल की ज़मीं कुछ यूँ सींच दी,
जो ख़ुद से बिछड़ गए थे, वो फिर ख़ुद से मिलने लगे।।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
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