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मुसाफ़िरों की शाम

                
                                                         
                            हम मुसाफ़िरों की भला कहाँ शाम होती है,
                                                                 
                            
हमारे सफ़र की हर घड़ी बेआराम होती है।

अगर कभी कहीं कोई हादसा भी होता है,
वो घड़ी भी कुछ ही पलों में तमाम होती है।

यूँ तो कई ग़ैर भी आवाज़ देकर बुला लेते हैं,
पर अजनबियों से कहाँ अपनों जैसी बात होती है।

कुछ इस तरह कटी उम्र घर से दूर अपनी,
आशियाने की चाहत भी दिल में नाकाम होती है।

उड़ती हवा ने रेत पर जितने भी नक़्श खींचे थे,
वो सब मिट गए, अब कहाँ वो पहचान होती है।

किसी के छोड़कर जाने का दुःख अपनी जगह,
मगर ठहरने की आदत ही कहाँ आसान होती है।

जलते चिराग़ों की लौ में जो ख़ौफ़ ठहरता है,
बुझते-बुझते ही उनकी भी तो शाम होती है।

बिछड़ कर उससे हम जिस शहर में भी ठहरे हैं,
वहाँ भी हर घड़ी बस इंतज़ार में तमाम होती है।

तूफ़ानों से जूझकर भी किनारे आपस में न मिले,
हर भटकती लहर की भी कभी तो शाम होती है।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 सप्ताह पहले

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