त्याग, समर्पण, धर्म, दया सब,
फ़ालतू की बातें लगती हैं।
संस्कार की बातें अब तो,
बीते ज़माने की लगती हैं।
चार दिनों के इस झूठे आकर्षण में,
पवित्र रिश्ते नीलाम हुए।
जहाँ गूँजती थीं कभी लोरियाँ,
वे घर अब श्मशान हुए।
हाथ में पकड़े इस काले शीशे ने,
घर-घर में दीवार उठाई।
एक ही छत के नीचे सब हैं,
पर मन में है गहरी खाई।
संस्कृति को अब पिछड़ा कहकर,
पश्चिम की हवस को अपनाते।
सीता-सावित्री को भूलकर,
पाश्चात्य राह पर बलखाते।
स्वार्थ, कपट और धोखेबाज़ी का,
आज यहाँ बाज़ार लगा है।
अपराधों की इस मदिरा में,
इंसानियत का खून बहा है।
उठो! संभालो डूबती नैया,
जड़ों की ओर लौटकर आओ।
मोह-माया के इस दलदल से,
अपनी आने वाली नस्लों को बचाओ।
जब तक आँगन में बुज़ुर्गों का,
छाँव भरा हाथ नहीं होगा,
तब तक इस भटके समाज का,
कभी कोई उद्धार नहीं होगा!
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