मेरी उड़ान और तुम्हारा आसमान
जो कहता है—
लुटाएगा मुझ पर जान को,
वही पंख काटकर
रोकता मेरी उड़ान को।
जिसके लिए मैं हर पल
यही प्रार्थना करती हूँ भगवान से—
“इसे आसमान तक पहुँचाना,
हर ऊँचाई इसके नाम करना।”
जिसके लिए दिन-रात
बस यही बिनती करती हूँ,
उसकी राहों से हर काँटा हटे,
उसकी हर मंज़िल आसान हो।
उसे संभालने में,
अपने परिवार का बाग खिलाने में,
मैंने अपना ही सपना मार दिया,
उसकी खुशियों के लिए
अपनी खुशियाँ हार दिया।
जिसे मैंने अपना भविष्य समझकर
अपना आज तक कुर्बान कर दिया,
वही इंसान
मुझे अपनी ज़िंदगी में
पनौती समझता है।
अजीब है ना रिश्ता भी—
मैं उसके लिए दुआ बनकर खड़ी हूँ,
और उसकी नज़र में
मैं ही उसकी बददुआ हूँ।
मैंने तो कभी
उसकी उड़ान नहीं रोकी,
बस उसके आसमान में
अपना थोड़ा-सा आसमान माँगा था।
— रजनी
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