मंज़िल पर पहुँचकर भी
तमाम पसंदीदा चीज़ें रास्ते में छोड़ने के बाद,
मंज़िल पर पहुँचकर भी क्या ही कर लोगे?
जिनसे दिल को सुकून मिलता था,
जिनके साथ मुस्कुराना आता था,
उन्हें ही पीछे छोड़कर
किस खुशी का जश्न मनाओगे?
जिस सफ़र में अपने ही छूट गए,
उस मंज़िल की कीमत क्या होगी?
सब कुछ पाकर भी अगर दिल खाली है,
तो बताओ—वो जीत आखिर किस काम की होगी?
ज़िंदगी सिर्फ़ मंज़िल का नाम नहीं,
रास्ते में मिले रिश्तों का भी हिसाब है।
तमाम पसंदीदा चीज़ें छोड़कर
मंज़िल पर पहुँच भी गए,
तो क्या ही कर लोगे?
— रजनी
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