मैं ऐसी ही हूँ
ऑनलाइन शॉपिंग करनी नहीं आती मुझे,
आज के दौर में कितना आसान है,
पर सीखना भी नहीं चाहती,
क्योंकि खर्चा भी तो
अपने ही खाते से होना है!
रेलवे टिकट बुक करना नहीं आता,
क्योंकि पति को छोड़कर
अकेले कहीं जाना ही नहीं चाहती।
सफर कितना भी खूबसूरत हो,
साथ उनका हो तो ही
मंज़िल अच्छी लगती है।
ऐसा नहीं कि मैं नौकरी कर नहीं सकती,
बस अब आदत-सी पड़ गई है,
पति के कैश पर
बड़े आराम से “हाँ” कहने की।
अपने पैसे खर्च करने से पहले
उनकी तरफ देखने की।
और सच कहूँ तो,
पति अलग रहें—
ये तो कतई मंज़ूर नहीं,
उनकी मौजूदगी में ही
मेरी छोटी-सी दुनिया पूरी सही।
हाँ, मैं थोड़ी आलसी हूँ,
थोड़ी कंजूस भी हूँ,
पर असल में शायद
मुझे सुविधाओं से ज्यादा
साथ की आदत है।
दुनिया चाहे मुझे
आलसी कहे या कंजूस,
मुझे तो बस इतना पता है—
पति साथ हों,
तो जिंदगी की हर सुविधा
अपने आप ख़ास लगती है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X