घर के बुज़ुर्ग
पहले घर के बुज़ुर्ग
झगड़े रोकने आते थे,
आज वही झगड़ों की कहानी
बढ़ा-चढ़ाकर सुनाते हैं।
पहले गलती पर समझाया जाता था,
रिश्तों को प्यार से बचाया जाता था,
आज गलती ढूँढ़ी जाती है,
और फिर दो लोगों को
एक-दूसरे के विरुद्ध भड़काया जाता है।
पहले बुज़ुर्ग बीच में खड़े होकर
दीवार बन जाते थे,
रिश्तों पर आने वाली हर चोट को
अपने सीने पर सह जाते थे।
आज वही रिश्तों की दरारों में
कील ठोकने लगे हैं,
जो घर जोड़ने का हुनर रखते थे,
वही घर तोड़ने लगे हैं।
पहले सास कहती थी,
“सब्र रख, बेटा, सब ठीक हो जाएगा,”
आज वही कहती है,
“इस घर में जो हो रहा है,
सब तेरी ही वजह से है।”
पहले बुज़ुर्गों का अनुभव
मुश्किलों का हल बन जाता था,
आज उनका अधूरा अहंकार
हँसता-खेलता घर जला जाता है।
पहले उनकी बातों से
बिखरे रिश्ते सँवर जाते थे,
आज उनकी नकारात्मक सोच से
अपने ही अपनों से बिछड़ जाते हैं।
रिश्ते तोड़ने के लिए
बाहर वालों की ज़रूरत नहीं होती,
जब अपने ही आग लगाएँ,
तो घर बचाने की कोई सूरत नहीं होती।
बुज़ुर्ग होना केवल उम्र का बढ़ना नहीं,
घर के लिए बरगद की छाँव बनना है,
अगर उन्हीं की सोच से रिश्ते टूटने लगें,
तो फिर उस उम्र के अनुभव का
आख़िर क्या अर्थ रह जाता है?
— रजनी
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