आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

घर के बुज़ुर्ग

                
                                                         
                            घर के बुज़ुर्ग
                                                                 
                            

पहले घर के बुज़ुर्ग
झगड़े रोकने आते थे,
आज वही झगड़ों की कहानी
बढ़ा-चढ़ाकर सुनाते हैं।

पहले गलती पर समझाया जाता था,
रिश्तों को प्यार से बचाया जाता था,
आज गलती ढूँढ़ी जाती है,
और फिर दो लोगों को
एक-दूसरे के विरुद्ध भड़काया जाता है।

पहले बुज़ुर्ग बीच में खड़े होकर
दीवार बन जाते थे,
रिश्तों पर आने वाली हर चोट को
अपने सीने पर सह जाते थे।

आज वही रिश्तों की दरारों में
कील ठोकने लगे हैं,
जो घर जोड़ने का हुनर रखते थे,
वही घर तोड़ने लगे हैं।

पहले सास कहती थी,
“सब्र रख, बेटा, सब ठीक हो जाएगा,”
आज वही कहती है,
“इस घर में जो हो रहा है,
सब तेरी ही वजह से है।”

पहले बुज़ुर्गों का अनुभव
मुश्किलों का हल बन जाता था,
आज उनका अधूरा अहंकार
हँसता-खेलता घर जला जाता है।

पहले उनकी बातों से
बिखरे रिश्ते सँवर जाते थे,
आज उनकी नकारात्मक सोच से
अपने ही अपनों से बिछड़ जाते हैं।

रिश्ते तोड़ने के लिए
बाहर वालों की ज़रूरत नहीं होती,
जब अपने ही आग लगाएँ,
तो घर बचाने की कोई सूरत नहीं होती।

बुज़ुर्ग होना केवल उम्र का बढ़ना नहीं,
घर के लिए बरगद की छाँव बनना है,
अगर उन्हीं की सोच से रिश्ते टूटने लगें,
तो फिर उस उम्र के अनुभव का
आख़िर क्या अर्थ रह जाता है?
— रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर