अब खुद को मिटाना नहीं है
हक़ीक़त से रूबरू हो गए हैं हम,
अब कोई ख़्वाब सजाना नहीं है।
बहुत की हैं ग़लतियाँ पहले,
अब उन्हें दोहराना नहीं है।
दोस्त बनें चाहे दुश्मन,
अब किसी से घबराना नहीं है।
जो लोग पीछे छूट गए हैं,
अब उन्हें मनाना नहीं है।
अब समझ गए हैं वजूद अपना,
दूसरों के लिए खुद को मिटाना नहीं है।
जो मिला है सबक़ ज़िंदगी से,
उसे यूँ ही भुलाना नहीं है।
अपनी ख़ुशियों का भी हक़ है हम पर,
हर दर्द को दिल में दबाना नहीं है।
अब अपनी राह खुद चुननी है,
किसी के पीछे चलकर ठोकर खाना नहीं है।
-रजनी
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