आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फिर एक बार

                
                                                         
                            रात अभी बाकी बहुत है,
                                                                 
                            
आधी गुजरी है आधी अधूरी है
अधूरी रात को पूरा होने से पहले
तू जरा सोच ले तेरे जो करम है
यह कल वापस तुझ पर ही नहीं आ जाएं जरा सोच ले
सोचने के लिए रुक जा कहीं रास्ते में
इंतजार कर नयी सुबह का
देता तो दाता है तो उस विधाता का नेक बंदा तो बन
मिटकर मिट्टी में मिल जाएगा
दुनिया से चला जाएगा
क्या नाम कमाया तुने
तू दाता का नाम खराब कर जाएगा
तूने पैसा तो कमाया है पर नाम नहीं कमाया
बिन मेहनत के मिला, हराम का मिला कैसे पचा पाएगा
भीख मांगना था तो अदब से मांगता
तेरे हलक से कैसे यह निवाला अंदर चला जाएगा
आज कर ले विचार रात को सवेरे में बदलने से पहले
काम कुछ अच्छे ऐसे कर ले तो फिर से इंसान बन जाएगा
अभी रात का अंतिम पहर गुजरने को है
सवेरा होने को है सोच ले
फिर से एक बार...........।
-'राज '
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर