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एक और तरल तो ढूंढ लिया है!

                
                                                         
                            प्यार ना मिले,
                                                                 
                            
इंसान टूट जाता है...

हर खुशी, हर अच्छी चीज़ से
रूठ जाता है

अपनी नाकामयाबी का
किसी और को दोष दे लूं...

माज़ी के जो सपने झलक रहे हैं...
उनसे आंख मूंद लूं

फिर एक महिना
फिर वक़्त थोड़ा

फिर संघर्ष की मांग...

फिर हर्ष की जगह, रोता राग...

भगवान
असल में मैं
चैन से,
कब बैठा हूं?

प्यार की हार
प्यास की धार
दोस्ती के वार

और उसपे असफलता,
दुख में डूबा समा...
सब लदता गया हो...

धुनों पे चल पाना
सरल कहां है?

मदहोश रहने
एक और तरल तो ढूंढ लिया है!

एक और छल तो
रच लिया है...

और,
मुझे ही नहीं पता है :(

-राहुल



.
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6 दिन पहले

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