आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विकारों से... बेहाल हो के... क्या मिलना है?

                
                                                         
                            बस, मैं पलट के
                                                                 
                            
जवाब ना दूं

ना अपनी सोचों का
भाला घोंपूं

हाल फिलहाल
की हार का

क्या, मलाल करना है?

कुछ बाहर के,
कुछ भीतर के

विकारों से... बेहाल हो के... क्या मिलना है?

हां, कुछ,
हासिल नहीं किया अभी 

अभी भी है
वैसी ज़बां सिली

बहुत
छोटे

लक्ष्य
पा लूं...

सब
भूलके...

मस्त
सोऊं :)

हम,
लेटलतीफी वाले हैं!

इस बीच...
थोड़ी शरीफी कमाए हैं

थोड़ी लिखाई बैठाए हैं
-राहुल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
22 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर