जाने, क़िस्मत क्यों
मुझे छेड़ती है?
मुझे अकेला क्यों नहीं
छोड़ देती है?
कितनी
दफ़ा रोया हूं?
कब कारण
सही नहीं
गम का...
रहा हो?
हास्य,
साथ नहीं दे रहा है
एहसास
बांधे रखना भी एक कला है
अकेलेपन से
इतना डरता क्यों हूं :(
मैं सपने, बुनने में तो
वक़्त लगाऊं!
कैसे,
पलक झपकते
सूरज ना गिरता हो...
कैसे नहीं
एक-एक पल बचाना
मेरी आदत में शुमार हुआ हो
जो सोचा है
सिर्फ़ वही काम करना है!
वक़्त, थोड़ा है...
सारा बस उसके नाम करना है
भाई,
सर नोचना...
तो किस्सा पुराना है...
अपना तो काम
रोज़, बाम से... शाम को पिघलते देखना है...
किसी रोज़, मकाम को... सीने से गले आ लगना है...
(भरम नहीं,
ये सब्र का जीना है)
-राहुल
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