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बुढ़ापे का सही अर्थ

                
                                                         
                            चलना जब सीखा बचपन में,
                                                                 
                            
पकड़कर रखा मेरे अपनों ने।
मर्यादा संस्कार के आगोश में,
जकड़कर रखा फिर समाज ने। 

बड़ा अखरता टोका-टोकी,
बात-बात पर उलाहना।
ज़हर से ज़्यादा कड़वा लगता,
आदर्शों का ये ताना-बाना। 

बचपन बीता अब हुए जवां,
अटखेलियों में मन मगन रहा।
शुरू हुआ दौर नई बंदिशों का,
चाल-चलन पर अब पहरा रहा। 

स्वच्छंद उड़ते परिंदे के,
कट गए बीच हवा में पंख।
समझ पाए ज़माने की रीत,
बज उठा बुढ़ापे का वो शंख।

बड़ा आसान है बातें करना,
पर संस्कारों का खरीदार नहीं।
रह गई पूंजी बस नसीहतों की,
जिसका अब कोई हकदार नहीं। 
-राधेश्याम खटीक
 
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