रोग सारे 'तू' मुझे दे दे,
दर्द को बना लूँ हमदर्द अपना।
एहसास न होने पाए ज़माने को,
दिल पर लगे गहरे ज़ख़्मों का!
टूटा तो मैं पहले से ही था,
दबाए बैठा सीने में गुब्बार।
कोशिश करता रहा मैं हर बार,
चलने की बेरहम ज़माने के साथ!
पराया मुझे जानकर,
कर गए जो लोग धोखा मेरे साथ।
खड़ा हूँ आज भी महफ़िल में,
पर याद आया मुर्दों का क़ब्रिस्तान!
स्मरण हुआ जब मेरे पापों का,
बेवजह समझा गुनहगार उनको।
दोष-दृष्टि मिटी अब चित्त से,
गुरु-सत्संग का हुआ ये सुधार!
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