सपने में
कल आए थे रात तुम सपने में,
मैं सोचूँ सवेरा ही क्यों हो?
ऐसा तो संभव नहीं हो पाना,
फिर असंभव ये कैसे संभव हो?
आकर बैठ गए पास मेरे तुम सपने में,
मैं सोचूँ आँखें ही क्यों खोलूँ?
ऐसा तो संभव नहीं हो पाना,
फिर कैसे एक रात में सारा जीवन तोलूँ?
घड़ी भर के सपने में ,तुम रुक जाते कितनी देर,
इस सुबह को आना ही था लौट फेर।
एक घड़ी बतियाए थे ,तुम मुझसे सपने में,
मैं सोचूँ इसमें और कितने क्षण जोड़ूँ?
ऐसा तो संभव नहीं हो पाना,
फिर कैसे नियत नियति के ये नियम तोड़ूँ?
वह कितना सुंदर क्षण था,
ठीक वैसा ही जैसा मेरा मन था।
कैसे खिल-खिलाकर हँसते थे ,तुम सपने में,
मैं सोचूँ इस क्षण को रोकूँ?
ऐसा तो संभव नहीं हो पाना,
फिर कैसे सपने का सच से नाता जोड़ूँ?
अब तक आए जितने ,उनमें यह सबसे सुंदर सपना मुझको कह रहे थे सपने में तुम अपना।
जाने कहाँ गए आकर तुम सपने में,
मैं सोचूँ तुमको खोजूँ?
ऐसा तो संभव नहीं हो पाना,
फिर कैसे बीते सपने को सोचूँ?
सीने में उठ रही अजब सी हलचल,
फिर आए न आए यह सपना कल।
मैं तो प्रसन्न थी, जीवन अपने में,
फिर क्यों आए, रात तुम सपने में?
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