वो जो जरा सी उदासी है
जैसे पानी में मीन प्यासी है
जैसे बहते दरिया में हो कोई खारापन
जैसे चख ली विष की बूंदे जरा सी है ।
मुट्ठी भर के कुछ लोगों ने तंत्र चला के रखा है
देश बनाने के नाम पर देश हिला के रखा है
करोड़ो की संख्या अपने जैसे ,
सोई रहतीं है ।
नेताओ के वादों पर हर बार खोई रहती है ।
वो दिन के उजालो में वादा करते है रोशनी लाने का
वो रात के समय वादा करते है तारे दिखने का
जैसे ठंडक में भी वो
ठंड की कमी न होने देंगे
बारिश में बारिश वाली गमी न होने देंगे।
वो वादा करते है हमारे ही रोये से कंबल बनवाने का
और दावा करते है
दिन में सूरज दिखाने का ।
वो बताते है कितनी ईमानदारी है सत्ता में
हम भी सिर हिलाते है हां में
और सोचते है
ये नहीं होगे तो हमें कौन बचाएगा।
उनके दावों पर भरोसा सीधी जनता हर बार करती है।
वादा खिलाफ़त को याद नहीं रखाती
उन्हें माफ़ करती है ।
टैक्स काट के कुछ बचा नहीं
महगाई की मार से तबाह हम सभी
प्राइवेट स्कूल वाली फीस तो हम कष्ट सह के भी देंगे
क्योंकि सरकारी स्कूलों का कोई भरोसा नहीं ।
वो जो दिन में ट्यूब लाइट देने का दावा करते है
वो जो अंधेरी रातों को चांद का वादा करते है।
जब सड़कों पर बारिश का पानी ख़त्म न हो
बैमानीया खुलेआम दिखे ।
जब कितने खर्चे सड़क बनाने में हुआ ,ये सरेआम न हो
जब न ठहर पाती हो नयी सड़के
पहली वाली बारिश में
और पुरानी सड़कों पर नाव चलाने की नौबत हो
जब बारिश जो जिंदगी का शबब है
मुसीबत सी बरसे
और बेचारा किसान या तो डूबे पानी में
या कभी सूखे से मरे।
महंगा है पेट्रोल क्यूंकि युद्ध चल रहा है
कभी_ कभी युद्ध की विभीषिका भी
बेइमानी नजर आती है ।
बू आती है जाने कितनी ही बार
नेताओं के कारनामों की जब
बैठे बिठाए अचानक से दंगों की खबर आती है
नही भाई हम इस बार भी इजाजत लेंगे
उनके ख़िलाफ़त की
इस बार भी सुन के खुश होगे उनके वादे
देखेंगे कोई कुदरत का करिश्मा
और सोचेंगे भेजा होगा
हमारे आकाओं ने ही सूरज की रौशनी को जामी पर
उगाये होगे चांद जो अभी कल नहीं था
किया होगा कोई करिश्मा
मन अपना कोलाहल में है
सीधी जनता हलाहल में है ।
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