शायद अब रह नहीं गई
वो जो कभी बुनती थी
कामयाबी के सपने कई,
जिनमें मनवाती थी लोहा अपना
इस जहाँ के अज़ीमों-शाहों से।
जुटी थी हर रोज़ बनाने
थोड़ा बेहतर जीवन को।
दिल-ओ-दिमाग़ से करती वो
सबके फ़ायदे का कारोबार।
पर अब दुनिया की परवाह
नहीं — शायद। या हो गई सुन्न
इस बेदर्दी के बाज़ार से,
जहाँ रोज़ नुमाइश लगती है
बचे-कुचे इंसानियत की।
अब वो हालातों को बदलने की
जद्दोजहत का जुनून न रहा।
या तुम्हारे ख़यालों में खोने में
है शायद वो सुकून —
जो कभी अपना नाम बनाने में था।
बस और नहीं है रस
इस बेहिस ज़माने में।
तुमसे मिलन की आस ही,
अब मेरी ज़िंदगानी में।
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