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विरहाग्नि....मुकम्मल राख की अधूरी दास्तान

                
                                                         
                            कि तुम मेरी चिता को जलते हुए शायद नहीं देख पाओगे...
                                                                 
                            
मेरे पास आकर भी उस दिन शायद मेरी साँसों को महसूस नहीं कर पाओगे..
बेशक शायद याद आएँगे वो लम्हे सारे जिन्हें तुम चाहो भी तो मेरे साथ जला नहीं पाओगे..
तुम्हारी प्रेयसी रूपी शरीर का एक-एक कतरा धधकती आग की लपटों से उस हवा में मेरे प्यार का गहरा अहसास बन घुलता चला जाएगा।
बड़ा डर लगता है यह किंचित मात्र सोच के भी कि उसके बाद वाकई इस जन्म में तुमसे फिर मिलना न हो पाएगा..
अपने प्रियतम के एक झलक दीदार में अनंत जन्मों की ठसक होती है वो तुम्हें शायद विरह के बाद ही समझ आएगा..
कि हमारे मज़हब में तो क़ब्रें दफ़न नहीं होतीं,
तुम अपनी गलतियों की माफ़ियों का जतन कहाँ करोगे..
पिघल जाओगे उस आग की गहराई को अपने अश्रुओं से छूकर..
पर अफ़सोस मुझे वापस गले नहीं लगा पाओगे..
शायद उस धुएँ में तुम्हारी ली हुई हर साँस तुम्हें मेरी याद में रुलाएगी।
जब पूरी तरह राख बन जाऊँगी, तब ये हवाएँ मेरी राख को तुम्हारी तरफ़ ले जाएँगी..
जाना उस दिन तुम चाहे जितने अश्क बहा लो मुझे तुम से दूर जाना होगा..
क्योंकि मुकम्मल करने इस अधूरे क़िस्से को अगली मर्तबा पूरी कहानी बनकर आना होगा।
-प्रियंका वालानी
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3 दिन पहले

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