खुशियों के पीछे भागे पड़े हैं...
अभी हम कहां ही जीना सीख पाए।
लहज़ा(moment) यहां से गुजर सा रहा है,
ख़लिश सी है मन में, ना कोई दुआए।
अगर ठहर जाते,
तो क्या थी बुराई,
दो बातें सुकून की और कर पाते।
शिकवों से दुनिया भरी ही हुई है ,
फसानों की भी यहां, कमी तो नहीं है।
अपनी कहो, किस अंधेरे में तुम हो
अतीतों के किन पन्नों में गुम हो।
जाए़जा सन्नाटे का लेकर तो देखो
हंसने की शायद वजह मिल जाए।
सुना है इनायत मौजूद हर जगह है
ढूंढे तो शायद, जीना सीख जाए।
खुशियों के पीछे भागे पड़े हैं...
अभी हम कहां ही जीना सीख पाए।
-प्रियंका जैन
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