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पापा का प्यार

                
                                                         
                            घर के मुखिया वो कहलाते,
                                                                 
                            
सुख में सबका साथ निभाते।
दुख में ढाल बनकर खड़े हो जाते,

जब भी बाहर से घर आते,
कुछ न कुछ खाने को ज़रूर लाते।
बिन बोले ही हर बात समझ जाते,
दिल की हर ख़ामोशी पढ़ जाते।

खुद धूप में चलकर,
हमें हमेशा छाँव देते हैं।
चेहरे पर मुस्कान रखकर,
हर ग़म को चुपचाप सह लेते हैं।

परिवार की खुशियों को पहले निभाते,
फिर क्यों अपनी ख़्वाहिशें दबा जाते?

पल भर में दिल टूट जाए
जब अपने ही ये सवाल करे -
क्या ही किए है मेरे लिए?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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