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जैसे मेरा खुद का कोई ख्याल नहीं ।

                
                                                         
                            जैसे मेरा खुद का कोई ख्याल नहीं, फिर भी
                                                                 
                            
लबों पर एक भी आता है सवाल नहीं ।
हां तो ये मैं खुद ही कहती हुं, कि
मैं बेमिसाल नहीं ।
जबकि आंखों से गिरते आंशू रुकते ही नहीं,
फिर भी मेरी आंखे लाल नहीं ।
जिन शख्सियत से मिली हुं मैं,
जिन्हें करीब से जाना है मैंने
जिन्हें लगता है कि हां सच में उन्हें पहचाना है मैंने
अगर सच में उनसे अपनी तुलना करुं, तो
जैसे कहीं मेरा नाम नहीं ।
जिन्हें भी पाया है मैंने,
अपना बनाया है मैंने ।
उनसे जुड़ जाना ऐसे , कि
जैसे उन्हें रुह में अपने बसाया है मैंने ।
ये सब यूं ही इत्तेफाक है,
क्या सच में मेरे खुदा इसमें कोई कमाल नहीं ।
एक - एक शब्दों को बारिकी से जोड़ते आयी हुं मैं,
ख्वाबों को बड़े ही प्यार से संजोती आयी हुं मैं ।
ये तो रहे मेरे दिल के भाव, शायद
इसमें मेरा कोई किरदार नहीं ।
पर क्या सच में,
जैसे मेरा खुद का कोई ख्याल नहीं ।।
--प्रीती गौतम
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2 महीने पहले

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