आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तराना ए दर्द ओ तमन्ना

                
                                                         
                            बना के बहाने क्या सोच के फासला मुझसे बढ़ाने लगे जान कर अंदाज़ आपका होकर मायूस दर्द बढ़ाने लगे है
                                                                 
                            
किया जो इक फैसला खिलाफ मेरे सह कर जीना पड़ेगा रोने से होगा कुछ भी नहीं दिया आस का बुझाने लगे हैं
झूठी शोहरत बढ़ाने वास्ते किया है ऐसा आपने हम बदनसीबों के दर्द की दवा नहीं सोच कर बर्बाद होने लगे है
होकर मायूस तेरी बेरुखी से बेचैन तमन्नाओं से बहलाना पड़ा है दिल हमें थाम कर दिल दर्द तुम्हें सुनाने लगे हैं
मिलती कहां चैन ओ सकूं किसी को इतनी आसानी से जला के आस का दिया बार बार याद तुम्हे करने लगे हैं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर