आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मिजाज़ ए रस्म ए बेवफाई

                
                                                         
                            आज दिल मुझसे सवाल कर बैठा रस्म ए उल्फत पर अब मुझसे ही हिसाब कर बैठा
                                                                 
                            
मैं भी बेचैन दिल में लाकर करार दर्द सारा दिल में महफूज़ कर तुमसे सवाल कर बैठा
चाहा था मैने दिल की किताब लिखना देख कर अंदाज तेरा मैं तुमसे ही करार कर बैठा
जिस रोज़ तेरे झूठ की सच्चाई खुली कल रात सो न सका तो मैं खुद से बगावत कर बैठा
गम ए उल्फत के कारवां में होकर शामिल ऐ चश्म ए करम मैं अब तुमसे हिसाब कर बैठा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर