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फसाना ए महरूम जिंदगी

                
                                                         
                            हिसाब अपनी ही बरबादियो का देने हम लगे मिले हो तुम बाद मुद्दत मिला जो दर्द हम कहने लगे हैं
                                                                 
                            
अभी तक होकर खामोश तन्हाइयों से ही दिल मैं बहला रहा था देख के तुझे सामने सच कहने लगे है
चिरागों का काम है अरमां दिल में ही बढ़ा जाना और समझ के तुम्हें मसीहा गलत क्या पूछने लगे हैं
वादा फरामोश हो ना सका मैं ये तुम भी जानते हो होकर अब मायूस तन्हाइयों से हम डरने लगे हैं
तुमको पता नहीं हर शाम करती हमें बेचैन और वक्त ए रुखसत सुन कर फैसला अब हम रोने लगे है
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3 महीने पहले

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