आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फसाना ए रस्म ए उल्फत

                
                                                         
                            तुम ही तो जान के अजनबी राह की दीवार हमें समझने लगे हो सोच कर महरूमी मेरी फासला अब बढ़ाने लगे हो
                                                                 
                            
हम क्या सोच कर खुदा तुम्हें ही समझ बैठे हैं बदल कर फैसला अपना अब तो दर्द मेरा बेशुमार आप बढ़ाने लगे हो
मिजाज़ नसीब का जाना कहां किसी ने किया कोशिश संभलने की मगर आप बदल कर अंदाज़ दर्द बढ़ाने लगे हो
करूं मैं क्या बड़े सलीके से ऐतबार आप पर करना है मिल कर बिछड़ना तो इक हादसा था ये सच समझाने लगे हो
देकर जख्म हज़ार मत छेड़ो तुम तराना ए उल्फत हर किसी से मुझको ठुकराने वाले ऐ दोस्त मुझको सताने लगे हो
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर