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फसाना ए मासूम दिल

                
                                                         
                            ना जंग में ना अदावत पे यकीं करता हूं मैं हूं शरीफ इंसान और इंसानियत पे यकीं करता हूं
                                                                 
                            
अपनी मुफलिसी पे भी मैं घबराता कभी नहीं जीने के लिए मैं हमेशा मेहनत पे यकीं करता हूं
मुझे दर्द देने वाले जो दर्द तूने दिया कोई बात नहीं मैं अपना दर्द ही अब पीने पे यकीं करता हूं
मैं तो इक फकीर हूं काम है मेरा सदा देना मैं तो अब गम ए फिराक में जीने पे यकीं करता हूं
ऐ खुदा मुझ पर कभी एहसान कर दिया करो मैं तो कातिलों को भी दुआ देने पे यकीं करता हूं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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