आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फसाना ए दर्द ओ तमन्ना

                
                                                         
                            टकरा कर तूफानों से दिल को हम समझाने लगे हैं रोने से होगा कुछ नहीं आफतों से ही हम खेलने लगे हैं
                                                                 
                            
देकर अपने हिस्से की बेचैनियाँ तुमसे ही कुछ कहना चाहता हूं और जान के गैर हमें आप दर्द देने लगे हैं
फिक्र में रोना मुनासिब नहीं बेचैन दिल को समझाना पड़ा और डूबा के हमें तन्हाई में नसीहतें देने लगे हैं
है गुरुर कितना अंदाज़ ए बेरुखी पर करके हमसे ही वादे हज़ार आप अब अंदाज अपना बदलने लगे हैं
दर्द ये भी फसाना ए दिल सिवा आपके गैरों से कह सकता नहीं लगा के नसीब दांव पे अर्ज करने लगे हैं

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर