टकरा कर तूफानों से दिल को हम समझाने लगे हैं रोने से होगा कुछ नहीं आफतों से ही हम खेलने लगे हैं
देकर अपने हिस्से की बेचैनियाँ तुमसे ही कुछ कहना चाहता हूं और जान के गैर हमें आप दर्द देने लगे हैं
फिक्र में रोना मुनासिब नहीं बेचैन दिल को समझाना पड़ा और डूबा के हमें तन्हाई में नसीहतें देने लगे हैं
है गुरुर कितना अंदाज़ ए बेरुखी पर करके हमसे ही वादे हज़ार आप अब अंदाज अपना बदलने लगे हैं
दर्द ये भी फसाना ए दिल सिवा आपके गैरों से कह सकता नहीं लगा के नसीब दांव पे अर्ज करने लगे हैं
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