तू ही ना मिला तो क्या हुआ अरमां दिल के सारे बुझा दिया मैने होकर खफा अपनी किस्मत से दर्द सारे भुला दिया मैने
ना कर सका ऐतबार मेरी वफाओं पर तो क्या करूं आजमा के वफा अपनी ही बार बार अब तुमको ही भुला दिया मैने
बढ़ा कर फासला दर्द ओ तमन्ना बढ़ाने वाले ये भी सोचो लिपट के दीवारों से होकर मायूस आईना तुम्हें दिखा दिया मैने
लगा के बेवजह इल्जाम मुझ पे गुज़रा ज़माना अपना तूने भुला दिया है रोने से होगा कुछ नहीं दर्द सारा समेट लिया मैंने
बस इक गुजारिश तुमसे मेरी बरबादियों पे मत जाना बदनसीबी से बढ़ कर कोई सजा नहीं बात दिल की सुना दिया मैने
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X