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फसाना ए दर्द ए दिल

                
                                                         
                            जालिम लगा दी तुमने आज़ महफिल में आग क्यूं बढ़ा के दिल के अरमां होकर मायूस जिंदगी से मिजाज़ तेरा सोचना है
                                                                 
                            
हम परदेशियों को मिला कब ठिकाना आसानी से सुन कर वादे हजार वफा की राह में अंदाज़ तेरा अब हमको सोचना है
मिल कर तुमसे फिर भी कांटों से दोस्ती करना पड़ा हमें अंजाम ए वफा जो भी होगा बुझा कर चिराग़ ए दिल सोचना है
दर्द ये फिर उसी राह तुमसे मिलने की तमन्ना हम कर बैठे और दिल का अरमां पास तेरे जाकर लौट आया सोचना है
दिल को भी चैन ओ सकूं कहां देख कर अंदाज़ ए मिजाज़ तेरा या रब तुमने भी क्या क्या मंजर दिखाया ये सोचना है
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एक घंटा पहले

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