मिटा कर अरमां तुम किसी के वादों पे सब्र मत करना हो जाते हैं अक्सर सब गैर बुरा वक्त आने पे ये सोचना
मुझे पत्थर जान के पिघलता भी देख लिया करो कभी तमन्ना जिंदा रख कर अपने आरजूओं में ये सोचना
झुका कर सर अश्क पीना छोड़ दो उठा कर सर शान से जीने का सलीका तुम सीख कर दिल में ये सोचना
उलझ के उलझनों में दिल अपना ना तोड़ना गर चाहो तो डूब कर मेरी आंखों में कभी तू दिल में ये सोचना
गर मुमकिन हो ख्वाहिशों से जी हुजूरी छोड़ दो तुम भुला कर जख्म सारे कभी दिल ओ दिमाग में ये सोचना
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